Khushbir Singh 'Shaad'
Description
कहने को एक आईना टूट बिखर गया लेकिन मिरे वजूद को किरचों से भर गया मैं जाने किस ख़याल के तनहा सफ़र में था अपने आहूत करीब से होकर गुज़र गया इक आशना से दर्द
...
ने चौंका दिया मुझे मैं तो समझ रहा था मिरा ज़ख्म भर गया शायद कि इन्तजार इसी पल का था उसे कश्ती के डूबते ही वो दरिया उतर गया मुद्दत से उसकी छाँव में बैठा नहीं कोई इस सायादार पेड़ इसी ग़म में मर गया खुशबीर सिंह 'शाद' का कलाम उर्दू के अदबी हलकों में दिलचस्पी से पढ़ा जा रहा है। एक ज़माना था जब मुशायरों में कुबूले-आम मेयार की सनद हुआ करता था लेकिन अगर किसी का क़लाम समाईन को भी मुतासिर करें और क़ारीन को भी मुतवज्जा करने में कामयाब हो तो उसका इस्हाक़ मुसल्लम हो जाता है। - गोपीचंद नारंग.
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Genres
History
Tags
Poetry
Reading Moods
No reading moods specified
Contributors
No contributors specified
Publishing Info
Publisher
Manjul Publishing
Month-Year
Jul, 2019
ISBN
ISBN-13: 9789388241977
ISBN-10: 9388241975
Language
Hindi
No. of Pages
140
Format
Paperback
Awards & Recognition
No awards specified
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First Reviewed by
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