Namvar Singh
Description
‘दूसरी परम्परा की खोज’ में नामवर सिंह आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के माध्यम से भारतीय संस्कृति और साहित्य की उस लोकोन्मुखी क्रान्तिकारी परम्परा को खोज
...
ने का सर्जनात्मक प्रयास करते हैं जो कबीर के विद्रोह के साथ ही सूरदास के माधुर्य और कालीदास के लालित्य से रंगारंग है। आठ अध्यायों वाली इस पुस्तक के प्रत्येक अध्याय का प्रस्थान-बिन्दु आचार्य द्विवेदी की कोई-न-कोई कृति है, किन्तु यह पुस्तक उन कृतियों की व्याख्या मात्र नहीं है और न उनके मूल्यांकन का प्रयास है बल्कि उनके माध्यम से उस मौलिक इतिहास दृष्टि के उन्मेष को पकड़ने की कोशिश की गई है जिसके आलोक में समूची परम्परा एक नए अर्थ के साथ उद्भासित हो उठती है। ‘दूसरी परम्परा की खोज’ से एक ऐसा व्यक्तित्व उभरता है जो अपनी सहजता में मोहक है, अपने संघर्ष और पराजय में भी गरिमामय है और अपनी मानव-आस्था में परम्परा के सर्वोत्तम मूल्यों का साक्षात् विग्रह है - कुटज के समान साधारण होते हुए भी मनस्वी और देवदास के समान मस्ती से झूलते हुए भी अभिजात तथा अपनी ऊँचाइयों में एकाकी। आलोचना कितनी सर्जनात्मक हो सकती है उसका उदाहरण है - ‘दूसरी परम्परा की खोज’।
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Genres
No genres specified
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Subjects
Reading Moods
No reading moods specified
Contributors
No contributors specified
Publishing Info
Publisher
Rajkamal Prakashan
Month-Year
Jan, 2009
ISBN
ISBN-13: 9788126715916
ISBN-10: 812671591X
Language
Hindi
No. of Pages
144
Format
Paperback
Awards & Recognition
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First Reviewed by
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