Kamlesh Verma, Suchita Verma
Description
सैद्धांतिक और व्यावहारिक आलोचना के संतुलन की जो परंपरा आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने शुरू की थी वह विचारधारा के दबाव अथवा रूपवादी प्रयास के कारण दूसरी राह
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पर चली गयी थी। बाद के आलोचक शुक्लजी की उस नसीहत को भूल गये कि साहित्य की अपनी ‘मूल सत्ता’ होती है। सभ्यता ऊपरी आवरण है जिसे समझना तो ज़रूरी है मगर उसी में डूब जाना ठीक नहीं है। आलोचना को अंततः साहित्य के सवालों और समस्याओं से जुड़ना है इसलिए साहित्य का मूलाधार अच रहना चाहिए। दूसरी परंपरा में होने के बावजूद मैनेजर पाण्डेय ने साहित्य के मूल स्वरूप को आत्मसात कर उसके क्रमबद्ध विवेचन का प्रयास किया है।
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Reading Moods
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Contributors
No contributors specified
Publishing Info
Publisher
Vani Prakashan
Month-Year
Jan, 2016
ISBN
ISBN-13: 9789350728444
ISBN-10: 9350728443
Language
Hindi
No. of Pages
220
Format
Hardcover
Awards & Recognition
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First Reviewed by
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