संपादक आराध्या अरु
Description
प्रेम तो अपने आप में एक अनोखा मृदुल मखमली एहसास है ही उसपर से पहले प्रेम की बात तो सबसे अनमोल है और हमेशा प्रिय भी.प्रेम की व्यथा भी प्रिय है तभी तो प
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्रेम की डगर पर चलना सुखद है । खोने - पाने के समीकरणों से दूर होती है प्रेम की डगर ....और केवल मन की गहराइयों से और पूरी ईमानदारी से निभाया जाता है यह रिश्ता, डूब कर, सराबोर होकर और जो आनंद प्रेमी अनुभव करते हैं वह भाषा की अभिव्यक्ति के परे है ।
यह सही है कि प्रेम के सतही अनुभव सबके अलग अलग हैं पर फिर भी हृदय के समर्पण और बिना किसी अपेक्षा से किया गया प्रेम ही प्रेम की परिभाषित कर सकता है । इतना आसान भी नहीं है ऐसा प्रेम करना जो प्रियतम की खुशी के अलावा कुछ भी और की उम्मीद न करे, तभी तो प्रेम की डगर पर चलना आसान नहीं है और तभी तो राधा बिरहन रही और मीरा दीवानी कही गई।
प्रेम की व्याख्या मुश्किल हो सकती है परन्तु प्रेम बहुत ही सरल सहज है.
प्रेम की व्याख्या असंभव. सबके अनुभव अलग, सबके प्रेमी की मानसिकता अलग. सही है.... बस गूंगे के मुंह में गुड़ जैसा. महसूस तो किया जा सकता है, बताया नहीं जा सकता. और बता भी दें तो कोई वैसा ही समझे जैसा महसूस किया.... एकदम संभव नहीं. प्रेम है ये सत्य है बाकि सच्चा, झूठा, कम ज़्यादा कुछ नहीं. प्रेम हमेशा निस्वार्थ होता है.... और निर्बाध भी. कहीं भी, कभी भी और किसी से भी.
"कुछ तहरीरें आँखों से भी लिखी जातीं हैँ,
अलबत्ता पढ़ी दिल से जातीं हैँ."
प्रेम में लिप्त प्रेमी युगल प्रेम नहीं लिख सकता. अक्सर एकतरफा निस्वार्थ प्रेम ही प्रेम की सही व्याख्या कर पाता है. राधा ने प्रेम जिया था और मीरा डूबी थी प्रेम में एकाग्र, एकचित और निर्बाध भावनाओं सँग.
तभी जिनका प्रेम साथ नहीं वो ही लिख पाते हैँ, व्यक्त कर पाते हैँ. प्रेम एक समग्र अनुभूति ही तो है, उसे मूर्त रूप के साथ से ज़्यादा एहसास से पिरोया जाता है. शायद तभी आज भी सूरदास, मीरा हमेशा प्रेम के पर्याय समझे जाते हैँ. प्रिय साहित्यकारों एवं साहित्यप्रेमियों इंकलाब प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ' ढाई अक्षर प्रेम के ' प्रेम के विभिन्न रंगों से सुसज्जित यह साझा काव्य संग्रह आप सभी को अवश्य पसंद आएगा।
- आराध्या अरु
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