परमजीत सिंह 'सूफ़ी'
Description
हिंदी साहित्य की श्रव्यकाव्य विधा के अंतर्गत् छायावाद की कुछ विशेषताओं जैसे व्यक्तिवाद, प्रकृति चित्रण, प्रेम चित्रण, और रहस्यवाद को माध्यम बनाकर इस क
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ाव्य-संग्रह की रचना की गई है; इस काव्य-संग्रह में रहस्यवाद को केंद्र में रखकर; प्रतीकों और उपमानों का प्रचुरता से उपयोग किया गया है। जो पाठक 'मैं कौन हूँ'? की खोज में साधनारत हैं उनके लिए निश्चित ही यह कविताएँ एक उत्प्रेरक के रूप में कार्य करेंगी और पाठक प्रकृति के रहस्यों को स्वयं के अनुभव के सापेक्ष कसौटी पर कस सकेंगे।
यह कविता-संग्रह मानस में कहीं गहरे हो गए संस्कारों की निर्जरा करने के साधन के रूप में भी सफल होगा और पाठक इन कविताओं में अपने मानस की खोज और परख कर सकेंगे और अनुभव करेंगे कि यह कविताएं उनकी अन्तरंग ‘सखी’ जैसी हैं; जो वक़्त-वक़्त पर नए-नए रूपों में पाठकों का पथ-प्रदर्शन कर रही हैपाठक इस कविता-संग्रह की यात्रा का आरम्भ प्रथम कविता में ‘माँ’ पर रचित एक अबोध मन से जन्मी अभिव्यक्ति से करेंगे और समापन उस कविता से करेंगे जिसमें उन्हें एक अजर-अमर दीपक से साक्षात्कार होगा; जो अनंत काल से निरंतर अंधियारे से द्वन्दरत है और पल-पल विजयी भव के वरदान से सुशोभित है। पाठक प्रथम और अंतिम कविताओं के मध्य ‘एक सहज अंतर्यात्रा’ का अनुभव करेंगे और उन पड़ावों से गुजरेंगे जहाँ उन्हें 'मनातीत प्रेम' काअनुभव होगा। यह काव्य-संग्रह ताने-बाने की झीनी-झीनी बीनी चंदरिया है जो संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण कर्मों का जीवन में कब, कैसे और क्यों प्रकटीकरण होता है; उस प्रक्रिया की एक झलक पाठकों को देता है और पदार्थ तथा मन के सम्पर्क से उत्पन्न प्रतिक्रियाओं के प्रति किस तरह साक्षी-भाव रखा जा सकता है उस जागरूकता की ओर अग्रसर करता है।
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