Harprasad Das
Description
देश को उत्तर–आधुनिक महाकाव्य माना गया है । बल्कि इसे सिर्फ एक संरचना ही कहा जाए तो कवि को कोई आपत्ति नहीं होगी यदि इसकी वास्तुकला में पाठक मेद, खनिज औ
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र काष्ठ के प्रयोग को पहचान ले । इस विलक्षण संरचना में बहुमुखी कल्पना का प्रयोग है, यथार्थ की एक मुख्य धारा इसमें कल्पना का स्रोत बनकर प्रवाहित होती है । किसी स्थिर बिन्दु से देश को देखने का तरीका इसमें अद्भुत रूप से बदलता है । इस बदलाव में एक तीव्र और जादुई शक्ति है जो कविताओं को एकात्मकता प्रदान करती है, हालाँकि यह संरचना किसी पूर्व–निर्धारित काव्यवस्तु को प्रतिष्ठित नहीं करना चाहती । देश की कविताओं में अनेक आरम्भ हैं और अनेक अन्त, परन्तु यह सब किसी एक निर्दिष्ट समाप्ति की ओर अग्रसर नहीं होता बल्कि एक व्यापक असमाप्ति का निर्माण करता है । इसका उत्तर–आधुनिक रूप इसी असमाप्त निर्मिति से बनता है । ‘देश’ भूखण्ड है, भाग्य है, निवास है, निर्वासन है, यहाँ तक कि ‘देश’ देशान्तर है और देशोत्तर भी । विविधता के बीच अस्तित्व की यह खोज वस्तुपरकता के परे शुद्ध कविता के अन्त%करण को प्रस्तुत करती है । समकालीन भारतीय साहित्य में इस कृति को अपनी कलात्मकता की लय, लोक–चेतना की मिथकीय पुन%प्रतिष्ठा और मार्मिक अस्तित्वबोध के लिए पहचाना जाएगा ।
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