Phanishwarnath Renu
Description
आज के युग में जहाँ भ्रष्टाचार का बोलबाला हो, चरित्रहीनता पराकाष्ठा पर हो, अपने और पराये का भाव-बोध जड़ जमाए बैठा हो, चारों ओर ‘हाय पैसा, हाय पैसा’ की अ
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फरा-तफरी मची हो, ऐसे माहौल में शान्तिपूर्वक जीवन बसर कर पाना किसी चुनौती से कम नहीं।
बेला गुप्त भी सहज जीवन जीना चाहती थी, लेकिन उनके साथ क्या हुआ? कई हादसों से गुज़रने के बावजूद वह टूटी नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य-पथ पर अग्रसर रही। लेकिन आज...?
आज वह टूट चुकी है। ईमानदारी, कार्य के प्रति निष्ठा—उसके लिए अब बेमानी हो चुकी है। जैसे सारी चीज़ों पर से उसका मोहभंग हो गया हो! और यही वजह है कि दूसरों के अपराधों को स्वीकार कर वह जेल-जीवन अपना लेती है।
‘दीर्घतपा’ फणीश्वरनाथ रेणु का एक मर्मस्पर्शी उपन्यास है। इस उपन्यास के माध्यम से लेखक ने जहाँ वीमेंस वेलफ़ेयर की आड़ में महिलाओं के यौन उत्पीड़न को उजागर किया है, वहीं सरकारी वस्तुओं की लूट-खसोट पर से पर्दा हटाया है।
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