Narmada Prasad Upadhyay
Description
विचार; चिंतन के निष्कर्ष का अमूर्त रूप है। यह सोचने की ऐसी परिणति है; जो कभी आगे चलकर क्रियान्वयन में मूर्त हो उठती है।
विचार जुगनू भी है; दीपशिखा भी
...
और सूरज भी। वह प्रकाश का हर ऐसा स्रोत है; जो अँधेरे से लड़ने को तत्पर है। वह लहर है; जिसके पास रेत पर अपनी पहचान रचने की संकल्प शक्ति है। वह छेनी है; जिसके पास किसी यक्षी; किसी शालभंजिका; किसी अंबिका को आकार देने की सामर्थ्य है। वह तूलिका है; जो ऐसे रूप को रच देती है; जो रूप हरेक को अपना लगता है। वह ऐसा दर्पण है; जिसमें प्रतिबिंब उलटे दिखाई नहीं देते। ऐसी परछाईं है; जो सूरज के ढलने के साथ घटती नहीं; बल्कि और लंबी होती चली जाती है।
विचार सुबह-सुबह दूब पर ठहरे हुए ओस के कण; ज़मीन पर बिछे हरसिंगार और टप-टप टपककर धरती को महकाते हुए वे फूल हैं; जो केवल धरती का सौरभ और शृंगार बने रहना चाहते हैं; उन्हें आकाश की ऊँचाई की दरकार नहीं होती।
—इसी संग्रह से
शब्दों के कुशल चितेरे श्री नर्मदा प्रसाद उपाध्याय के लालित्यपूर्ण ललित निबंधों का पठनीय संकलन।
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Genres
Literary Fiction
Tags
Fiction
Short Stories (single author)
Reading Moods
No reading moods specified
Contributors
No contributors specified
Publishing Info
Publisher
Prabhat Prakashan
Month-Year
Aug, 2018
ISBN
ISBN-13: 9789387968141
ISBN-10: 9387968146
Language
Hindi
No. of Pages
152
Format
Hardcover
Awards & Recognition
No awards specified
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First Reviewed by
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