Becaina, Śyorājasiṃha
Description
कवि ‘भोर के अँधेरे में’ एक ऐसा शीर्षक देता है जो रैदास के निर्वर्ण सम्प्रदाय, कबीर के निर्गुण और फुले, अम्बेडकर के समतामूलक आधुनिकताबोध के बगैर सम्भव
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नहीं है। कवि बड़ा सपना देखता है, जिसमें लोकतन्त्र ही कविता में फूलता-फलता है। कवि को लगता है स्वराज रूपी भोर भी उसके लोगों के लिए नहीं है। खास कर दलित-वंचित के लिए भोर में भी अँधेरा है, आज़ादी में भी गुलामी है, यही पूरे काव्य कर्म का निचोड़ है, सारतत्व है और यही कवि की समूची बेचैनी का सबब और केन्द्रीय समस्या है। वह अस्पृश्यता रहित स्वतन्त्रता का सपना देखता है।
-डॉ. यशवन्त वीरोदय
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