Arun Khore
Description
‘हमारे भोजन में और सुपरिंटेंडेंट के भोजन में हमें तो काफी फर्क नजर आता । एक तो रोटियाँ सुन्दर और घी चुपड़ी होतीं । साथ ही, साग और दाल की कटोरी होती । स
...
ुपरिंटेंडेंट साहब एक–दो निवाले खाकर थाली अपने अभिप्राय के साथ भिजवाते । यदि कुछ होता तो रसोई बनानेवाली और मास्टर को बुलाया जाता और उन्हें आवश्यक सूचनाएँ दी जातीं । सुपरिंटेंडेंट के घर थाली लेकर एक लड़का जाता । कई बार उनका विश्वासपात्र लड़का ही थाली लेकर जाता । इसलिए कई बार मैं भी वह थाली लेकर गया । साहब की ‘टेस्ट’ होने के बाद थाली ले जानेवाले लड़के को उसी थाली में खाना पड़ता । उसकी दृष्टि से यह एक सौभाग्य की बात होती है । कभी–कभी रोटियाँ अधिक बन जातीं तो जिस दल को कम मिलतीं, उन्हें दूसरी बार परोसी जातीं । सबकी दृष्टि से ऐसे क्षण बहुत कम होते । पर जब ऐसा मौका आता तो लगता, ऐसी स्थिति कभी खत्म न हो ।’’
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Genres
No genres specified
Tags
Arborist Merchandising Root
Self Service
Reading Moods
No reading moods specified
Contributors
No contributors specified
Publishing Info
Publisher
Rajkamal Prakashan
Month-Year
Jan, 2001
ISBN
ISBN-13: 9788171196555
ISBN-10: 8171196551
Language
Hindi
No. of Pages
135
Format
Hardcover
Awards & Recognition
No awards specified
Available at
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First Reviewed by
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