Ravi Sharma
Description
हर लहर से पनपती
बनती-बिगड़ती परछाइयाँ
बहती हुई खुशियाँ
या फिर सिमटी हुई तनहाइयाँ
कभी लम्हों से झाँकते वो
हँसी के हसीं झरोखे
कभी खुद से ही छुपाते
खुद ह
...
ोंठों से आँसू रोके
कभी दिलरुबा का हाथ पकड़ा
तो कभी माँ की उँगली थामी
कभी दोस्तों से वो झगड़ा
तो कभी चुपके से भरी हामी
कभी सवाल बने समंदर
तो कभी जवाब हुआ आसमान
कभी दिल गया भँवर में
तो कभी चूर हुआ अभिमान
कभी सपने थे व़फा के
तो कभी ज़फा से थे काँटे
कभी कमज़र्फ हुई धड़कन
तो कभी सबकुछ ही अपना बाँटे
कभी बिन माँगे मिला सब
तो कभी माँग के भी झोली खाली
कभी भगवान् ही था सबकुछ
तो कभी आस्था को दी गाली
कभी सबकुछ था पास खुद के
पर दूसरों पर नज़र थी
कभी सबकुछ ही था खोया
फिर भी नींद बे़खबर थी
कभी ख्वाब ही थे दुनिया
तो कभी टूटे थे सारे सपने
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Genres
History
Tags
Literary Criticism
Poetry
Reading Moods
No reading moods specified
Contributors
No contributors specified
Publishing Info
Publisher
Prabhat Prakashan
Month-Year
Jan, 2020
ISBN
ISBN-13: 9789353222178
ISBN-10: 9353222176
Language
Hindi
No. of Pages
256
Format
Hardcover
Awards & Recognition
No awards specified
Available at
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First Reviewed by
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