Jacinta Kerketta
Description
शहर के सम्पर्क और नए समय के प्रभाव में आदिवासी समाज भी अब ठीक-ठीक वैसा नहीं रहा, जैसा जंगल और प्रकृति ने उसे बनाया था। वह बदल रहा है और अफ़सोस कि अधिक
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तर विकृति की ओर ज़्यादा बदल रहा है। नागर सभ्यता अपनी तमाम नकारात्मक ऊर्जा के साथ उसे अपनी चपेट में ले रही है। जसिंता केरकेट्टा की ये कहानियाँ जैसे बदलाव की इस प्रक्रिया का जीवन्त दस्तावेज़ हैं। बिना किसी कलागत आग्रह के सरल-सीधी कथा-कहन के साथ वे इन कहानियों में आदिवासी स्त्रियों की असहायता को भी उजागर करती हैं और पुरुषों में बढ़ते ताक़त के नशे की ओर भी संकेत करती हैं। कुछ कहानियों में उन्होंने ऐसे वयस्क मूल्यबोध की ओर भी इशारा किया है जिसको स्वीकार करने में नागर जन की तथाकथित आधुनिकता भी बग़लें झाँकने लगेगी। मसलन ‘रिश्ता’ कहानी में विवाह नामक संस्था को आमूल-चूल पुनर्परिभाषित करते नैना, सूरज और सुरजमुनी के संवाद। संवाद-प्रधान कुछ कहानियों में धर्म-आधारित राजनीति और आदिवासी जीवन पर उसके प्रभाव को लेकर भी अच्छी रोशनी पड़ती है। व्यवस्था और अवधारणा के स्तर पर बहुत सूक्ष्म और रेडिकल बदलावों के संकेत इन कहानियों में कई जगह मिलते हैं। ये कहानियाँ बताती हैं कि आदिवासी समाज में भी भले ही पुरुषों ने स्त्री के लिए कोई सम्मानजनक जगह नहीं रखी, बाहरी दुष्प्रभाव में भले ही बेटे अपनी माँओं-बहनों के साथ हिंसा करने लगे हैं, लेकिन स्त्री अभी भी अपनी संस्कृति, अपनी प्राकृतिक सहजता को लेकर सचेत है, उसे खोने को तैयार नहीं। हिंसा का शिकार होकर भी वह हिंसा को नहीं चुनती। आदिवासी दुनिया के संघर्षों, मूल्यों, पीड़ाओं, उसके सामने मौजूद ख़तरों और बदलावों को दर्शातीं कहानियों का एक रोचक संग्रह।
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