Jaishree Roy
Description
सघन संवेदनात्मकता और चुनौतीपूर्ण कथाविन्यास के कारण समकालीन कथा साहित्य में सहज ही ध्यान खींचने वाली युवा कथाकार जयश्री रॉय का यह उपन्यास ‘औरत जो नदी
...
है' सम्बन्धों की शिराओं के सहारे स्त्री-पुरुष मानसिकता के गहरे अन्तस्तल में उतरने का एक महत्त्वपूर्ण उपक्रम है। जीवन के हर क्षेत्र में पीढ़ियों से उपेक्षा और प्रताड़ना के दंश झेलती स्त्री की आत्मचेतना से उद्दीप्त अकुलाहट और अपने ही विषवाणों से बिंधे आत्मप्रवंचना से श्लथ पुरुष की आत्म-स्वीकृतियों के परस्पर कदमताल की अनुगूँजों से भरी यह कृति एक ऐसा आईना है जिसमें हम सब अपने-अपने चेहरे की शिनाख़्त कर सकते हैं। प्रेम का व्यामोह सिरज कर अन्ततः देह की चौहद्दी में दम तोड़ते पुरुष और मन के मीत की तलाश में बार-बार छली जाती स्त्री की यह समानान्तर यात्रा देह, प्रेम, परिवार और ज़िम्मेवारियों के चौखटे में न सिर्फ़ स्त्री-पुरुष के मानसिक भूगोल के बारीक अन्तरों को पुनःपरिभाषित और पुनर्रेखांकित करती है बल्कि कालीन के नीचे छुपी उन दरारों को भी निर्ममता से उघाड़ जाती है जिसे हम जानबूझ कर नहीं देखना चाहते। ‘औरत महज़ एक योनि नहीं होती परन्तु मर्द शायद आपादमस्तक एक लिंग ही होता है' का सूत्र मखमली कालीन के नीचे छुपी ऐसी ही सच्चाइयों का निर्मम अनावरण है।
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Genres
No genres specified
Tags
Arborist Merchandising Root
Self Service
Reading Moods
No reading moods specified
Contributors
No contributors specified
Publishing Info
Publisher
Vani Prakashan
Month-Year
Jan, 2019
ISBN
ISBN-13: 9789388684354
ISBN-10: 9388684354
Language
Hindi
No. of Pages
136
Format
Hardcover
Awards & Recognition
No awards specified
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First Reviewed by
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