वृषभ प्रसाद जैन
Description
प्रकाशकीय अभिनन्दन
हिंदी संभवतः विश्व में अकेली ऐसी भाषा है, जो जैसी बोली जाती थी, वैसी ही लिखी भी जाती थी, परन्तु कालान्तर में वैसा नहीं रहा, उसकी
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वर्तनी की बहुत-सी विशेषताएँ गायब होती जा रही हैं। उसका एक कारण भारत का लगभग १000 वर्ष तक विदेशी दासता में रहना और उस काल में हिंदी का राज-काज की भाषा के रूप में नहीं रहना, परिणाम यह हुआ कि उस काल में आधुनिक पढ़े-लिखे समाज से हिंदी कटती गई। न हिंदी को राज्याश्रय रहा और न ही पढ़े-लिखे वर्ग का समर्थन । शिक्षा में भी वह महारानी के स्थान पर दासी-सी बन गयी। यद्यपि हिंदी आम जनता की बोलचाल की तो भाषा बनी रही, परन्तु एक उत्कृष्ट भाषा के रूप में उसका स्तर गिरता गया। केवल कुछ गिने-चुने विद्वानों, साहित्यकारों और कवियों को छोड़कर किसी ने भी हिंदी के गिरते स्तर की ओर ध्यान नहीं दिया। स्वतन्त्रता के पश्चात् भी राज-काज में अँग्रेजी का वर्चस्व बने रहने के कारण कमोबेश ऐसी ही स्थिति बनी रही।
हिंदी को सँवारने हेतु कई सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएँ तो बनीं और कई विश्व हिंदी सम्मेलन भी हुए, परन्तु हिंदी अपना खोया हुआ वैभव पुनः प्राप्त न कर सकी।
इस ओर पुरजोर शक्ति के साथ कभी कोई सार्थक प्रयास भी नहीं हुआ। हिंदी के नाम पर बनी संस्थाएँ भी निष्क्रिय सी पड़ी रहीं। ऐसी स्थिति में हमारे मंच के राष्ट्रीय संयोजक श्री वृषभ प्रसाद जी जैन ने इस पुस्तक को लाकर एक अतुलनीय और सराहनीय प्रयास किया है। यह उन के गंभीर और दीर्घकालिक चिंतन का परिणाम है। यह प्रयास हिंदी को सँवारने का तो कार्य करेगा ही, साथ में भारत की अन्य भाषाओं पर भविष्य में किये जाने वाले कार्य के लिए एक प्रकाश-स्तम्भ का कार्य भी करेगा, इसलिए हम ने यह निर्णय लिया कि इस का प्रकाशन भी भारतीय भाषा मंच से किया जाए और इस के आलोक में मंच का वर्तनी संबंधी कार्य आगे बढ़ाया जाए।
भारतीय भाषा मंच से जुड़ाव संबंधी प्रपत्र का लिंक https://forms.gle/WdkcTtPJ8SizAdtU8
हम यह भी चाहते हैं कि इस के पाठक हमारे साथ सह-बद्ध होकर इस काम को आगे बढ़ाएँ, हम आप से यह अपेक्षा भी करते हैं कि आप गूगल फॉर्म पर जाकर कृपया अग्रांकित सर्वेक्षण प्रपत्रों को भरने/भरवाने का कष्ट करें, जिस से कि भारतीय भाषा मंच के साथ आपका जुड़ाव हो और इस के कार्यों में आप के विचारों का भी हम उपयोग कर सकें तथा इस प्रकार आप हम से जड़े रह सकेंगे।
हम अखिल विश्व जैन मिशन न्यास के सहयोग (यथा- १.अपने पुस्तकालय का इस कार्य के लिए उपलब्ध कराना, २.प्रकाशन के लिए अपने माध्यम से आई एस. बी. एन. संख्या का उपलब्ध कराया जाना आदि) के आभारी हैं।
अब अंत में श्री वृषभ जी जैन को पुनः साधुवाद....
ईश्वर दयाल
राष्ट्रीय सह-संयोजक, भारतीय भाषा मंच
नई दिल्ली
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