Ved Prakash Verma
Description
प्रस्तुत पुस्तक में नैतिक भाषा और तर्कना के विश्लेषण से संबंधित अधि-नीतिशास्त्र के स्वरूप, क्षेत्र, उदय तथा विकास के साथ-साथ प्रकृतिवाद, निर्प्रकृतिवा
...
द, अलौकिक या अतींद्रियं सत्ता संबंधी सिद्धांतों, संवेगवाद, परामर्शवाद, उचित तर्क संबंधी सिद्धांत और नव्य प्रकृतिवाद इन मुख्य अधिनैतिक सिद्धांतों का विस्तृत विवेचन एवं आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। इन प्रमुख अधि-नैतिक सिद्धांतों की विवेचना के अतिरिक्त इसमें तथ्यात्मक कथनों से नैतिक निर्णयों के निगमन की महत्त्वपूर्ण समस्या पर भी विस्तारपूर्वक विचार किया गया है। अधि-नीतिशास्त्र जैसे जटिल विषय को भी सरल भाषा-शैली में प्रस्तुत करके लेखक ने इसे पाठकों के लिए सुगम तथा बोधगम्य बना दिया है। नैतिक दर्शन की इस महत्त्वपूर्ण विधा पर हिन्दी भाषा में यह प्रथम पुस्तक है जो इस क्षेत्र में दीर्घकाल से चले आ रहे एक बहुत बड़े अभाव की पूर्ति करती है। हमें विश्वास है कि प्रस्तुत पुस्तक विशाल हिन्दी भाषी क्षेत्र के विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों में नैतिक दर्शन की इस नवीन विधा—अधि-नीतिशास्त्र—का अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों तथा शिक्षकों के लिए बहुत उपयोगी एवं ज्ञानवर्धक सिद्ध होगी।
अमृतसर के अंधविद्यालय में प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात् डॉ० वेदप्रकाश वर्मा ने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा दिल्ली में माध्यमिक और उच्च शिक्षा प्राप्त की। आगरा कॉलेज के छात्र के रूप में उन्होंने 1960 में आगरा विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एम०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की जिसमें उन्होंने केवल प्रथम श्रेणी ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान भी प्राप्त किया। सेंट जॉन्स कॉलेज आगरा तथा आगरा कॉलेज में लगभग दो वर्ष तक अस्थाई रूप से अध्यापन कार्य करने के उपरान्त डॉ० वर्मा को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से शोध छात्रवृत्ति प्राप्त हुई और अक्तूबर 1963 में उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के दर्शन-विभाग में शोध कार्य प्रारंभ किया। ‘समकालीन नैतिक दर्शन में व्यक्तिनिष्ठवाद तथा संवेगवाद’ पर शोध प्रबन्ध लिखकर उन्होंने 1967 में इसी विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। सितम्बर 1967 से वे दिल्ली विश्वविद्यालय के दर्शन-विभाग में अध्यापन कार्य कर रहे हैं।
अब तक डॉ० वर्मा की निम्नलिखित सात पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। (1) ‘नीतिशास्त्र के मूल सिद्धांत’, एलाइड पब्लिशर्स, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 1977, द्वितीय संस्करण 1982, पुनर्मुद्रण 1984, 1987, संशोधित एवं परिवर्धित तृतीय संस्करण 1988, संशोधित एवं परिवर्धित चतुर्थ संस्करण 1994। (2) ‘डेविड ह्यूम का दर्शन’, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर, 1978। (3) ‘महात्मा गांधी का नैतिक दर्शन’, इंदु प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण 1979, द्वितीय संस्करण 1989 (4) ‘सम कन्टेम्परेरी मैटा-ऐथिकल थ्योरीज़’, दिल्ली विश्वविद्यालय, 1978। (5) ‘समकालीन विश्लेषणात्मक धर्म-दर्शन’, हिन्दी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, प्रथम संस्करण 1982, द्वितीय संस्करण 1986। (6) ‘दर्शन-विवेचना’, हिन्दी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, 1989| (7) ‘धर्म-दर्शन की मूल समस्याएँ’, हिन्दी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, प्रथम संस्करण 1991, द्वितीय संस्करण 1995। इन पुस्तकों में से डॉ० वर्मा की प्रथम तीन पुस्तकें उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा पुरस्कृत हो चुकी हैं। उन की पाँचवीं पुस्तक पर ‘अखिल भारतीय दर्शन-परिषद’ द्वारा दिया जाने वाला ‘स्वामी प्रणवानंद दर्शन पुरस्कार’ भी उन्हें प्रदान किया गया है।
उपर्युक्त पुस्तकों के अतिरिक्त डॉ० वर्मा ने दर्शनशास्त्र से संबंधित लगभग पचास शोध-पत्र भी लिखे हैं जो दर्शन विषयक विभिन्न पत्रिकाओं तथा पुस्तकों में प्रकाशित हो चुके हैं।
इन शोधपत्रों के साथ-साथ उन्होंने भारत की सामाजिक और आर्थिक समस्याओं पर बहुत-से लेख भी लिखे हैं जो अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं।
Read more