Doodhnath Singh
Description
गद्य और वृत्तान्त का आकर्षक किन्तु अजीब संयोजन है ‘आखिरी कलाम’ जो उपन्यास होते हुए भी उपन्यास के मानदंडों की अवेहलना करते हुए पाठकों में एक अनकही उत्स
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ुकता पैदा करता है। कथा का विस्तार कुछ इस तरह से इस उपन्यास में हुआ है कि उपन्यास रचना की सीमाएँ पृष्ठ-दर-पृष्ठ टूटती चली जाती हैं और गद्य तथा गल्प का चमत्कारी रसायन पाठकों को बाँधे रखता है। अपनी इसी शिल्पगत विशेषता के कारण ही ‘आख़िरी कलाम’ कालजयी उपन्यास के रूप में मिथकीय-संस्कृति के विश्लेषण की पवित्र किन्तु निहत्थी छटपटाहट भी है जो मिथक को इतिहास में बदलने की कोशिशों का पर्दाफाश भी करती है। इस तरह विचार, संरचना और संस्कृति पर सफल बहसों का निर्वेद भी है यह कृति। इन्हीं एकल बहसों से ‘आख़िरी कलाम’ की कथा का विन्यास हुआ है और यह उपन्यास अपने समय के संसार का शब्द-चित्र प्रस्तुत करने में सफल सिद्ध हुआ है। इन्हीं एकल बहसों से अतीत और वर्तमान की एक नई ‘पोलेमिक्स’ बन पड़ा है - ‘आख़िरी कलाम’। बाबरी मस्जिद के ध्वंस को विमर्श के केन्द्र में रखकर लिखा गया यह उपन्यास अतीत, इतिहास, मिथक, साहित्य और संस्कृति की स्तब्धकारी पुनर्रचना है।
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Genres
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Reading Moods
No reading moods specified
Contributors
No contributors specified
Publishing Info
Publisher
Rajkamal Prakashan
Month-Year
Sep, 2006
ISBN
ISBN-13: 9788126712939
ISBN-10: 8126712937
Language
Hindi
No. of Pages
435
Format
Paperback
Awards & Recognition
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First Reviewed by
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