Damodar Sharma
Description
आधुनिक जीवन और पर्यावरणविज्ञान की अंधाधुंध दौड़, मनुष्य का अपरिमित लालच, तेजी से क्षत-विक्षत होने वाले प्राकृतिक संसाधन और प्रदूषण से भरा संसार कैसा चि
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त्र उभारते हैं? जिस गति से हम विकास की ओर बढ़ रहे हैं, क्या उसी गति से विनाश हमारी ओर नहीं बढ़ रहा है? फिर नतीजा क्या होगा? मानवता के सामने यह एक विराट् प्रश्नचिह्न है । यदि इसका उचित समाधान कर लिया गया तो ठीक, वरना संपूर्ण जीव-जगत् एक विराम की स्थिति में खड़ा हो जाएगा । प्रश्नचिह्न या पूर्ण विराम! कौन-सा विकल्प चुनेंगे हम?
प्रस्तुत पुस्तक में इन्हीं कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्नों को सामने रखकर पाठकों से सीधा संवाद स्थापित करने की चेष्टा की गई है ।
पुस्तक स्वयं में बहुआयामी है परंतु इसकी सार्थकता तभी है जबकि पाठक इसमें उठाए गए बिंदुओं से मन से जुड़ जाएँ । यदि पर्यावरण हमारे चिंतन का केंद्रबिंदु है तब यह पुस्तक गीता-कुरान की भाँति पर्यावरण धर्म की संदेश वाहिका समझी जाएगी । हमारा विनीत प्रयास यही है कि पाठक आनेवाली शताब्दी की पदचाप को पूर्व सुन सकें और रास्ते के काँटों को हटाकर संपूर्ण जीव-जगत् के जीवन को तारतम्य और गति प्रदान कर सकें ।
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Genres
Science & Technology
Tags
Nature
Reading Moods
No reading moods specified
Contributors
No contributors specified
Publishing Info
Publisher
Prabhat Prakashan
Month-Year
Jan, 2009
ISBN
ISBN-13: 9788173150821
ISBN-10: 8173150826
Language
Hindi
No. of Pages
372
Format
Hardcover
Awards & Recognition
No awards specified
Available at
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First Reviewed by
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