K.R. Malkani
Description
जैसा कि लेखक खुद कहते हैं, यह जेल-डायरी नहीं है, न ही यह इमरजेंसी का वृत्तांत है। इसकी बजाय यह आपातकाल पर पार्श्व प्रकाश है। मल्कानी ने एक बंदी के रूप
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में जेल में जो कुछ भी देखा, सुना और महसूस किया, उन पर अपने अनुभवों को लिखा है। हिसार, रोहतक और तिहाड़—इन तीन जेलों में उन्होंने इक्कीस महीने बिताए, जहाँ उनकी मुलाकात अपराधियों से लेकर आला नेताओं समेत तरह-तरह के लोगों से हुई। यह उनके विषय में एक बेहद मानवीय दस्तावेज है, जो कभी मनोरंजक, कभी मायूस करनेवाला तो कभी-कभी पीड़ादायी हो जाता है।जेल में एकांत में बिताए गए लंबे समय ने लेखक को हिंदू-मुसलिम समस्या पर गहन विश्लेषण का अवसर दिया, जिसके विषय में उन्होंने नई और उम्मीद जगानेवाली बातें लिखी हैं। पूरी संवेदनशीलता के साथ लिखी गई इस पुस्तक में मर्मस्पर्शी छोटी-छोटी कहानियाँ हैं, जिनमें सियासी ज्ञान भी है, और जिनके कारण पढ़ने में यह पुस्तक बेहद रोचक हो जाती है। यह न केवल किसी एक व्यक्ति का दृष्टिकोण सामने रखती है, बल्कि सभी बंदियों के जीवन की झलक भी दिखाती है।
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